Gujarish

Gar sajda waakai hai dil au rooh ki paak awaaz, to uthaaiye paimaana aur kehiye "ai janaab" ... "IRSHAAD"

Gar na lage ki is ibaadat gaah main khuda nahin, to ek sher ada kijiye aap bhi "ai janaab" ... "IRSHAAD"

Monday, September 12, 2016

जीने दे उनको, मरना है जिनको !

मैं चिंगारी,
तू बारूद,
हम मिल जाएंगे,
सब जल जाएंगे!
हिज़ाब ओढ़ लेने दे,
महताब तोड़ लाने दे,
जीने दे उनको, काफ़िर,
मरना है जिनको आखिर!

Thursday, November 26, 2015

कभी वक़्त बेच कर भी दो रोटी ना कर सके थे हासिल,
सोने के भाव पे भी अब मिलती नहीं हैं रातें!

कभी आबरू के बदले, दामन का किया था सौदा,
सरे बाजार खड़े हैं अब पल्लू गैरों का थामे!

कभी जूत्ते घिस दिए हमने, एक जरा सी छत्त के लिए, 
अब आँधियों में चलते, हम नंगे पाँव अक्सर !

ज़िन्दगी तेरा तरीका, मुझको समझ ना आया!
जिंदगी तेरा सलीका, मुझको तनिक ना भाया!!

तपते-जलते, लड़ते-मरते रहते हो

दंगों में तलवार उठा लेते हो,
पर्वत तोड़ के दयार बना लेते हो,
हर जबाब से एक नया सवाल बना लेते हो,
जरा-जरा सी बात का बवाल बना लेते हो,
लड़ते-मरते, तपते-जलते रहते हो,
तपते-जलते, लड़ते-मरते रहते हो!

कब मना है?

है अँधेरी रात पर सितारे दिखाना कब मना है?
घटा में चुपके भी, चाँद-तारे, बताना कब फना है?
मौत के बिस्तर पे चार आने जी लेना कब मना है?
चार जुमले, दिल की, सुनना-सुनाना कब मना है?

गर्दिशों में मुस्कुराना कब मना है?-२
मैयतों में गुनगुनाना कब मना है?-२
मुसीबतों में न-डरना कब मना है?-२
मोहब्बतों में मर जाना कब मना है?-२

यूँ कि,,,,क्यूँकि,,,,

चमकता हूँ मैं, पर सितारा नहीं ,
भटकता हूँ! यूँ ही आवारा नहीं, यूँ कि,
बेचारी दुनिया का बेचारा सही,
बेसहारे ख़ुदा का बेसहारा सही!

लरजता हूँ मैं, पर छुइ मुई नहीं,
चुभता हूँ। यूँ ही कटीली सुई नहीँ,क्यूँकि,
हकीकत के वास्ते हकीकत यही ,
अकीदत के रास्ते अकीदत यही!

गरजता हूँ मैं, पर शिकारी नहीं,
सोचता हूँ! यूँ ही भिखारी नहीं! यूँ कि,
मरने के बाद फिर मरना कभी?
डरने के बाद फिर डरना कभी?

उलझता हूँ मैं, पर लटाएं नहीं,
खलता हूँ! यूँ ही हटायें नहीं, क्यूंकि,
बंदों की बस्ती में बंदा वही,
अंधों की हस्ती में अँधा वही!

Friday, January 2, 2015

ख्याल जो दिल मैं है

चाँद देख रात भर रो लिया,
अश्कों से घर भी धो लिया,
धुलता नहीं मलाल जो दिल में है,
भुलता नहीं ख़याल जो दिल में है,

समंदर एक सांस में पी लिया,
ज़िन्दगी एक आस में जी लिया ,
ठहरता नहीं बवाल जो दिल में है,
मरता नहीं ख़याल जो दिल में है,

आग को आँखों में भर लिया,
काँटों को ज़बां पे धर लिया,
ज़बाब नहीं सवाल जो दिल में है,
ख़राब नहीं ख़याल जो दिल में है,


वल्लाह जबाब नहीं

ज़िन्दगी खाबों खिलोनो में गुजर जाए तो वल्लाह जबाब नहीं,
कश्ती बाखुदा किनारों पे ठहर आये तो वल्लाह जबाब नहीं,
फिरकापरस्ती शैतानी कवायत है, हैवानियत की इबादत है,
फिरकापरस्ती नामुरादों से मुकर जाए तो वल्लाह जबाब नहीं!

उनका दामन चाँद सितारों से भर जाए तो वल्लाह जबाब नहीं,
घर उनका एक हजारों में नजर आये तो वल्लाह जबाब नहीं,
बेवफाई रूह से गद्दारी है, अपने माजी से नाफ़रमानी है,
बेवफाई से पहले क़यामत का कहर आ जाए तो वल्लाह जबाब नहीं!

दस्तूर-ए-मैयत पे हमारी वो आ जाएँ तो वल्लाह जबाब नहीं,
दम निकलते वक्त वो एक जरा नजर आ जाएँ तो वल्लाह जबाब नहीं,
बद-अंज़ाम से बदतर कोई बदनसीबी नहीं, बदख्तर नहीं,
मुकद्दम बदनसीब को बददुआ वो देने आ जाएँ तो वल्लाह जबाब नहीं!

ख़लिश

मोहब्बत में वो जीने-मरने की कसमों को ख़लिश बताते थे,
मोहब्बत में वो अब जीते हैं, मरते हैं, जीते हैं, मरते हैं,जीते हैं, मरते हैं!

वो कल कहाँ से लाऊं?

मेरी जेहन मैं जो पड़ा है,
मेरी हस्ती से जो बड़ा है,
मेरे वास्ते जो लड़ा है,
मेरे साए में जो खड़ा है!
जो कल गुजर गया वो,
वो कल कहाँ से लाऊं?
वो कल गुजर गया जो,
वो कल कहाँ से लाऊँ?

नहीं ढूँढने से मिलता,
ना ही आग में जो जलता,
ना हया, ना ही शिरकत,
ख़ामोशी ना ही दस्तक!
मुझे जिन्दा जला गया वो,
तो हल-चल कहाँ से लाऊँ?
वो कल गुजर गया जो,
वो कल कहाँ से लाऊँ?

ना लिखा गया जो अबतक,
ना आ सका जो लब-तक,
ना अक्स, ना नुमाइंद,
हर वक़्त जो मुजाहिद!
कहकर मुकर गया वो,
तो-मैं बल कहाँ से लाऊँ?
वो कल गुजर गया जो,
वो कल कहाँ से लाऊँ?

गर्दिश में भी....

गर्दिश में भी हसीं अरमान  रखते हैँ,
फुर्सत में तो आखों में  आसमान रखते हैं,
समंदर की लहरों में अपना जाम रखते हैं,
हर महफ़िल में अलग पहचान रखते हैं!

ज़िन्दगी कुछ ईस क़दर सरे-आम रखते हैं,
की मौत के आगे का भी मुक़ाम रखते हैं,
पर केवल तेरे लिए ये इमान रखते हैं ,
कि तेरे बिना ये ज़िंदगी हराम रखते हैं!

तेरे भेजे सारे पैग़ाम रखते हैं,
तेरे छुवे सारे सामान रखते हैं,
तेरी यादों की एक दूकान रखते हैं ,
दिल में मोहब्बत का एक तूफ़ान रखते हैं !

Tuesday, October 11, 2011

जगजीता मेरे! रब जीता तूने,

जग जीता तूने!
रब जीता तूने!
देश और दुश्मन सब जीता तूने!

दरिया सूनी, सागर सूने;
पर्वत रोती, जंगल ढूंढें,
आशिक, बुद्जिल, शायर, कातिल,
सब हैं खलिश में, सब तुझे ढूँढें,
बस्ती, मस्जिद, मंदिर, महफ़िल,
मैखाने, दरगाहें और दिल,
धड़कन, आतिश, प्रेम और साजिश,
चाँद और तारे, सब जीता तूने,
जगजीता मेरे! सब जीता तूने,
जगजीता मेरे! जग जीता तूने,
जगजीता मेरे! रब जीता तूने,
जगजीता मेरे! सब जीता तूने!

(a tribute to my maestro Jagjit Singh. May your soul rest in peace)

Friday, August 26, 2011

इस जुम्मे क़यामत आ भी जाए तो क्या गम है?

कुचली जाती जिंदगियां, ज़िन्दगी की तलाश में,
मुर्दा आखें खुली अभी भी न जाने किसकी आस में,
ज़िन्दगी बसरी गुजरी कब्रों को तलाशते, तराशते,
दास्ताँ-ए-हकीकत आबाद ओ अमन हर लाश में,

ऐसे में इबादत न ही की जाए तो क्या गम है?
इस जुम्मे क़यामत आ भी जाए तो क्या गम है?

Sunday, August 21, 2011

रगों का रक्त

रगों का रक्त आखों में उतरता जा रहा है,
है लिए मशाल, सड़कों पे मचलता जा रहा है,

कभी ये आस के आधीन ख़्वाबों पे पड़ा था,
कभी ये पास के संगदिल गुनाहों से लड़ा था,
कभी ये लूट लाता हक किसी के स्वेद का था,
कभी ये डाल आता दो निवाला संवेद का था,
अभी ये कुछ अलग सा चिलचिलाता जा रहा है, 
मेरे रगों का रक्त आखों में उतरता जा रहा है,

किस्से, बातें हो रही बाज़ार में हर किस्म की है,
मेरा रूह मांगता कीमत मेरे जिस्म की है,
खौफ खौफ में भरा किनारे पे बेबाक सा है 
हौसला इस बार भगत सिंह और असफाक सा है
नसों में कुछ चिंगारी सा चटकता जा रहा है, 
मेरे रगों का रक्त आखों में उतरता जा रहा है,

इन्कुँलाब बुलंद हो कि ये केवल हसरत नहीं
जिंदाबाद का जलजला है ये कोई नफरत नहीं
ये बुलंदी मुत्तालिक इंसानियत के नाम से
हर कदम इस बार दिल से हर कदम ईमान से
उष्णता से जिस्म मेरा तमतमाता जा रहा है, 
मेरे रगों का रक्त आखों में उतरता जा रहा है 

Thursday, August 4, 2011

खुशी

गुलाबों के आशियाने में,
खुशबू भी है और बहार भी!
भवरे कि गुंजन में,
प्यार भी है और खुमार भी!!
काटों की चुभन में दर्द नहीं, कर लो यकीं,
यही तो है मोहब्बत यारों! यही तो है खुशी!!!

मौसम सर्द हुई, हवा का रुख बदला,
किसी आक्रोश से वक़्त आँधियों में बदला,
बिजली चमकती जाती है कड़क कड़क कर,
बादल गरजते बरसते बस्ती उड़ा ले चला,
पर उस पेड़ का पंछी अपनी पलटन संभाले पड़ा है वहीँ का वहीँ,
यही तो ज़िन्दगी है यारों! यही तो है खुशी!!

आँखों की शोखी अब तक पथरा चुकी है,
जमाने ने जुल्मों सितम बरपा रखी है,
थक चुके हम हकीकत का बोझ ढोते,
रुक चुका लहू हमारे नसों पर का है,
कुचले, मसले जाने के बाद भी सांस तो है कहीं कहीं,
यही तो है बेखुदी यारों! यही तो है ख़ुशी!!

घटा में छुपके सितारे कभी फना नहीं होते,
बन्दे लाख कहर बरपा लें पर खुदा नहीं होते,
होती है मुश्किलें हजारों वफ़ा की राह में,
उठा लो दीवार ऊंची पर दीवाने कभी जुदा नहीं होते,
लड़ते हैं, मरते हैं, जीत भी होती है कभी कभी
यही तो इबादत है यारों! यही तो है खुशी!!

Sunday, August 15, 2010

Sabko bata do !!!

मशालों में राखों की केवल लपटें बची हैं,
सीने में हसरतों की केवल करवटें बची हैं,
सपनों की राह में अब जब कांटें चुभते हैं
"अँधेरा है, अँधेरा है" लोग क्यूँ चीखते हैं ?
चाँदनी तो है अभी? अंधेर नहीं हुई है अब तक,
भारत! कुछ करो; देर नहीं हुई है अब तक!

चूल्हों में दीमक के घरोंधे कच्चे हैं अभी भी, जला दो!
नफरत की आग जली है बस अभी अभी, बुझा दो!
भूखों के कफ़न में हरकत बची हैं अभी भी, हवा दो!
सरहद में लोहा लिए वो खड़े हैं अभी भी , दुआ दो!
अमन गया, आशा है! देर नहीं हुई है अब तक,
सबको बता दो! सबको बता दो! सबको बता दो!

Saturday, June 26, 2010

tafri

तफरी तेरे जलवे की हया लूट ले गयी
राख में लपेट हलक से जबां लूट ले गयी
रफ्ता रफ्ता के रिवाज़ की रब ही जाने
एक झटके में न जाने तू क्या क्या लूट ले गयी

Monday, June 21, 2010

benaam rishta

हर चिलमन की फितरत में दाग नहीं होता
हर मोड़ सफ़र का मुकम्मिल मकाम नहीं होता
हर चिंगारी का आग अंजाम नहीं होता
हर लिफ़ाफ़े में ख़ुशी का पैगाम नहीं होता
आंशू भी कभी ख़ुशी के होते हैं यहाँ
और ग़मों का भी कभी भरा पूरा सागर
मगर हर रिश्ते का यहाँ नाम नहीं होता
और हर बेनाम रिश्ता बदनाम नहीं होता

Sunday, February 7, 2010

इरशाद इरशाद

नूर-ए-इल्म से नाता है इंसा का पैदाइश के साथ
दायरा-ए-अंधेर बढ़ता ही जाता है, रौशनी के साथ

ग़मों का दरिया कर जाता है हर बे-ग़म को बर्बाद
कतरे कतरे का नाता है इसका अपनी किसी बेगम के साथ

चीर के रख दो किसी का फ़ोलादी जिस्म,
या कि दो लब्ज़ अर्ज़ करो मजनू के मसलन,
कहो वो, जो हो चुका, जो हो रहा है, और जो होगा इन्तेकाल के बाद,
महफ़िल में पड़ा, हर शराबी तो चीखता है बस इरशाद ! इरशाद ! इरशाद !

Friday, October 16, 2009

रंगीन ताजमहल

अब जब ये समझ में आ गया के जो हुआ सब सही है
खुशी नहीं तो गम ही सही, ऐसा तो नहीं के कुछ भी नहीं है

तब इतनी मुद्दतों से ख़ामोश रहने का मतलब नहीं नीकलता
आखें मूँद लेने से कभी सामने का ज़ाहीर सच नहीं बदलता

हर गम को एक ही तराजू में तौलने की ज़रूरत नहीं है
हर रंग का एक अपना अलग ही रंग है इस जहाँ में

ज़िन्दगी होती ही है छोटी, पता ही न चला कब मिट गई
बस चंद नगमों मैं ही हमारी पूरी कहानी ही सिमट गई

Wednesday, October 7, 2009

भरा भरा

भटकते रहे ताउम्र शहर-शहर चमन-ऐ-हस्ती को करने कुछ हरा भरा
भटकना है अब ताउम्र हमें गली-गली गेम-ऐ-जुदाई से बस भरा भरा