Gujarish

Gar sajda waakai hai dil au rooh ki paak awaaz, to uthaaiye paimaana aur kehiye "ai janaab" ... "IRSHAAD"

Gar na lage ki is ibaadat gaah main khuda nahin, to ek sher ada kijiye aap bhi "ai janaab" ... "IRSHAAD"

Tuesday, July 28, 2009

जलसा-ए-मैयत-ए-मोहब्ब्त

जला दो यारों कि अब और जला नहीं जाता !
उनकी निक्हत बिन अब और रहा नहीं जाता !!
गा रुदाली चीख के की बे-हिस् हो जाए दुनिया !
मेरे जनाज़े की हुल्लड़ भी लोगों से सुना नहीं जाता !!

घरवालों ज़रा चुनकर लाना लकडी सूखी सख्त !
पता है कि ये मुर्दा नख़रे बहुत करेगा जलते वक़्त !!
पहरें बीत गयीं फ़िर भी मचलता है क्यूँ कब्र में !
छोड़ उसकी याद, ढूंढ खुदा को बैठ कहीं सब्र में !!

कैसी धधक उठी ये आग उनके अश्को के धार से !
जैसे कर रही है आजाद हमें वो इस संसार से !!
मेरी मैयत पे ही अब वो याद करते हैं हमें खुदा,
फ़िर से मेरे मौत की अरजी कर अपने खाते-दार से !!

मेरी राख को' साकि ' डाले आना तुम समन्दर में !
तो काजल होने को उनके फिरेगा ये मुत्तलक-सिफ़र में !!
उससे पहले पिरो लेना मेरी खाख़ को इनके गेशू से !
बिफर के मारा मारा फिरेगा तो ये दर् बदर में !!

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